Arthgyani
होम > टैक्स (कर) > कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती से बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा

कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती से बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा

कॉर्पोरेट कर सरकार के सालाना राजस्व का एक बड़ा भाग होता है

बीते दिनों  सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती करने की घोषणा की थी|जिसका अर्थ था सरकार को 1.45 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नहीं मिलेगा| हालाकि इस खबर के बाद आये शेयर बाजार में उछाल ने तमाम चर्चाओं पर फिलहाल विराम लगा दिया है| ऐसे में एक सवाल लाजिमी है कि, क्या महज corporate tax घटा देने से अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन शुरू हो जायेंगे| ताजा विश्लेषणों के अनुसार तो यही प्रतीत हो रहा है| ऐसे में अब वक्त है पुनः अवलोकन का जिसमे अर्थव्यस्था की मूल समस्या पर चिंतन शामिल हो| इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा में सर्वप्रथम जान लेते हैं|

 कॉर्पोरेट टैक्स क्या है?

कॉर्पोरेट कर या कॉर्पोरेट टैक्स कंपनियों पर लगाया जाता है। प्राइवेट लिमिटेड, सूचीबद्ध और असूचीबद्ध सभी कंपनियां इस कर के दायरे में आती हैं। कंपनियों की कुल आय पर कॉर्पोरेट टैक्स लगाया जाता है। कॉर्पोरेट कर सरकार के सालाना राजस्व का एक बड़ा भाग होता है। कॉर्पोरेट कर घटाने का फैसला सभी घरेली कंपनियों और नई मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों पर लागू होगा। कॉर्पोरेट कर को निगम कर या कंपनी कर भी कहा जाता है।

कर संग्रह में कमी चिंता का सबब:

Corporate tax पर बड़ी पहल के बाद भी मुश्किलें कम नहीं होंगी|आर्थिक सुस्ती से जूझ रही सरकार के लिए कर संग्रह भी बुरी खबर ले के आया है| सरकार का कर संग्रह उसके तय लक्ष्य से काफी पीछे चल रहा है| चालू वित्त वर्ष की एक अप्रैल से 17 सितंबर की अवधि में सरकार का प्रत्यक्ष कर संग्रह 4.7 प्रतिशत बढ़कर 5.50 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 5.25 लाख करोड़ रुपये रहा था|जबकि इस वित्त वर्ष के लिये सरकार ने कर संग्रह में 17.5 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया था| अर्थ व्यवस्था से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो पूरे वर्ष के लिए बजट में निर्धारित 7.03 लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा  जुलाई में ही  5.47 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है|ऐसे में कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती से सरकार के राजकोषीय घाटे में एक और घटक जुड़ जाएगा|

जी एस टी संग्रह में भी जबरदस्त कमी की आशंका :

चालू वित्त वर्ष (2019-20) में जीएसटी संग्रह उम्मीद से 40,000 करोड़ रुपये कम होने की आशंका है| मीडिया ख़बरों के अनुसार केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते गोवा में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस बारे में राज्यों के वित्त मंत्रियों को बता दिया है|जिसके बाद  राज्यों ने इसकी भरपाई करने को कहा है|राज्यों की ये मांग वस्तुत जीएसटी को मंजूरी देते समय केंद्र सरकार कि स्वीकारोक्ति से सम्बंधित है| उस समय केंद्र सरकार ने  पांच साल के भीतर किसी भी राज्य के सालाना राजस्व में बढ़त 14 फीसदी से कम रहने की स्थिति में इसकी भरपाई का आश्वासन दिया था | जीएसटी कानून के मुताबिक यह क्षतिपूर्ति  सेस के द्वारा एकत्र फंड से की जानी थी| गौरतलब है कि कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती ऐसे समय में आई है जब सरकार अपने जीएसटी संग्रह लक्ष्य से काफी पीछे है| सरकार ने इस वित्त वर्ष में 1 लाख करोड़ रुपये (8,000 करोड़ रुपये/माह) के करीब जीएसटी संग्रह होने का अनुमान लगाया था, जो अगस्त महीने में 7,272 करोड़ रुपये रहा| जिसकी वजह से अनुमानित लक्ष्य के पूरा होने पर संदेह गहराता जा रहा है|विदित हो कि साल के पहले चार महीनों में जीएसटी कलेक्शन कम होने की भरपाई में केंद्र सरकार राज्यों को 45,784 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति दे चुकी है| इसके अलावा राज्य यह भी मांग कर रहे हैं कि राजस्व की क्षतिपूर्ति 8 साल तक की जाए| ऐसे में कॉर्पोरेट टैक्स की नयी दरों के कारण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ अवश्य पड़ेगा|

गिरती जीडीपी भी है चिंता का सबब:

Corporate tax में कटौती का सीधा असर जीडीपी पर भी पड़ना तय है|ध्यान रहे कि वित्त वर्ष 2019-20 के लिए वित्तीय घाटे को जीडीपी का 3.3 प्रतिशत अर्थात 7.04 लाख करोड़ रुपये प्रोजेक्ट किया गया है| कॉर्पोरेट कर में कटौती करने से पहले सरकार को आशा थी कि वो इससे 7.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व इकट्ठा करेगी| अब 1.45 लाख करोड़ रुपये की छूट देने के बाद वित्तीय घाटा जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत हो जाएगा|यह आंकड़े सामान्य रूप  में जीडीपी के 12 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने के अनुमान पर आधारित हैं|वर्तमान मंदी को देखते हुआ ये वृद्धि दर प्राप्त करना बेहद मुश्किल है|ऐसे में जीडीपी अगर 12 प्रतिशत की दर से नहीं बढ़ती है तो वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत से भी ऊपर जा सकता है|

कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती से जुड़े कुछ सवाल:

सामान्य अर्थों में वित्त मंत्री द्वारा कॉर्पोरेट टैक्स कम करने के कदम को कंपनियों के विस्तार और रोजगार सृजन की सम्भावना से जोड़ कर देखा जा रहा है|विभिन्न विश्लेषक इसे  विदेश कंपनियां के भारत में निवेश  से घरेलू उत्पादों की मांग बढाने से भी जोडकर देख रहे हैं|हालांकि इस कदम से  बाजार में क्या सुधार होगा ये अभी भविष्य की बात है|इन फायदों के नाम पर बहुत से बड़े सवालों को नकारा नही जा सकता|ऐसा ही एक सवाल  इंडियन एक्सप्रेस में पी वैद्यनाथन अय्यर ने भी उठाया है|उनके अनुसार  इस उपाय से अर्थव्यवस्था को कितना सहारा मिलेगा कह नहीं सकते, लेकिन सरकार को मिलने वाला राजस्व काफी कम हो जाएगा|पहले  कॉर्पोरेट टैक्स की दर 40 फीसदी थी,जिसे 2004-05 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने ड्रीम बडट में घटाकर 35 फीसदी कर दिया था| पुनः सात साल बाद कॉर्पोरेट टैक्स 35 से घटाकर 30 फीसदी कर दिया गया था| निर्मला सीतारमण ने इसे 8 फीसदी और घटाकर 22 फीसदी करने की घोषणा की है|इसके अलावा  नई कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स घटाकर 15 फीसद कर दिया गया है|

विदित हो कि  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) ने कुछ दिनों पूर्व ही  भारतीय अर्थव्यवस्था को  5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य की बात की थी| इस लक्ष्य को प्राप्त करने के  लिए अर्थ व्यवस्था को हर साल औसतन 14-15 फीसदी बढ़ना जरूरी है|सरकार ने 1,45,000 करोड़ रुपए के घाटे के बावजूद कॉर्पोरेट टैक्स में बड़े पैमाने पर कटौती कर दी है, जो जीडीपी के एक फीसदी से कुछ कम है|ऐसे में सरकार का बढ़ता राजकोषीय घाटा निश्चित रूप से आने वाले दिनों में नयी मुश्किलों में इजाफा करेगा|

विदेशी कंपनियों के भारत में निवेश के लिए सरचार्ज समाप्त करने बड़े बैंकों का विलय करने जैसे तमाम उपाय अर्थव्यवस्था की मौजूदा सेहत सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं हैं| इनसे बाजार में मांग बढ़ाने में ज्यादा मदद नहीं मिलेगी|रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी सुब्रमण्यम और डी सुब्बाराव ने भी संदेह जताया है कि इससे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिल सकती है|अर्थव्यवस्था का ढांचा सुधारने के लिए भूमि एवं श्रम सुधारों की आवश्यकता है| अगर भूमि की उपलब्धता और उसकी कीमतों में संतुलन नहीं होगा तो इन उपायों से ज्यादा मदद मिलने वाली नहीं है| अय्यर का सवाल है कि कॉर्पोरेट कंपनियों का ज्यादा पैसा उपलब्ध कराने का क्या मतलब है? इससे सिर्फ कंपनियों को अपना बहीखाता सुधारने में मदद मिलेगी नए निवेश की संभावना नहीं बनेगी|एक तरह से यह निजी कर्जों को हलका करने का प्रयास ही है, जिससे कंपनियों को नए सिरे से उधार लेने का मौका मिल सकता है|

अपने खर्चे घटाकर वित्तीय घाटे को कम कर सकती है सरकार:

सरकार खर्च कम करके वित्तीय घाटे को कम कर सकती है,लेकिन निर्मला सीतारमण कह चुकी हैं कि सरकार की खर्च कम करने की कोई योजना नहीं है| चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सरकार के खर्च में 8.9 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है, लेकिन इसी तिमाही में अर्थव्यवस्था केवल 5 प्रतिशत की दर से बढ़ी| इन आंकड़ों के अनुसार देखें तो जीडीपी की वृद्धि में सरकार के खर्चे का बड़ा योगदान रहा है|अत: सरकार के खर्चे को कम ना करने की निर्मला सीतारमण की टिप्पणी खटकती है| हालाकि सरकार दूसरे विकल्प के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का पूरी तरह से विनिवेश करना भी है| इससे सरकार के पास राजस्व इकट्ठा होगा,लेकिन यह करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा| सरकार को मजदूर संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ेगा|इस विरोध के बावजूद सरकार अगर ऐसा कर भी लेती है तो भी इससे कॉर्पोरेट कर कटौती के पूरे खर्च की भरपाई नहीं होगी|ऐसे में वित्तीय घाटे का बढ़ना तय है.जिसका अर्थ  है कि सरकार को रिजर्व बैंक से और अधिक उधार लेना पड़ेगा|सरकार के ज्यादा उधार लेने का से दूसरे उधार लेने वालों के लिए कम पैसे बचेंगे| जिससे ब्याज दरें और बढ़ जाएंगी,जबकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार लगातार ब्याज दरों को नीचे रखने की बात कहती रही है|सरकार को इस साल अपने पांच बड़े करों से 23.2 लाख करोड़ रुपये का राजस्व जमा करने की आशा है| यह पिछले साल इन पांच बड़े करों के मुकाबले इकट्ठा किए गए राजस्व से 20 प्रतिशत अधिक है,किन्तु इसके बाद भी वित्तीय घाटे में इजाफा होगा|ऐसे में कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती से अर्थव्यवस्था के दूरगामी लाभ की गणना करना जल्दबाजी होगी|