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क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्या है?

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां देशों के GDP का अनुमान लगाती हैं और समय समय पर उसकी समीक्षा कर घटाती और बढाती भी हैं|

क्रेडिट रेटिंग किसी भी देश, संस्था या व्यक्ति आदि की कर्ज लेने या उसे चुकाने की क्षमता का मूल्यांकन करती है| क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां परोक्ष रूप से यह बतातीं है कि देश, संस्था या व्यक्ति आर्थिक रूप से कितना मजबूत है और उसको कर्ज देना कितना खतरनाक है या इसमें कोई जोखिम नहीं है| साथ ही ये एजेंसियां देशों के GDP का अनुमान भी लगाती हैं और समय समय पर उसकी समीक्षा कर घटाती और बढाती भी हैं|

क्रेडिट एजेंसियां कैसे कार्य करती है ?

क्रेडिट रेटिंग का प्रभाव दोतरफा होता है| अर्थात किसी सामान्य संस्था या देश को को बड़ी क्रेडिट एजेंसी अच्छी रेटिंग दे दे तो वहां पर निवेश की आयत होने लगती है, वहीं दूसरी तरफ अगर अच्छा व्यवसाय कर रहे संस्थान या देश को भी खबराब रेटिंग देने से निवेशक वहां पैसा लगाने में संकोच करने लगते हैं| इस बात को एक समान्य उधारण से समझ सकते हैं| किसी प्रख्यात फिल्म समीक्षक ने सामान्य कारोबार कर रहे किसी फिल्म को अच्छी रिव्यु दे दी और उसके बाद दर्शकों की संख्या बढ़ने से उस फिल्म ने बहुत अच्छा कारोबार किया| इसके ठीक विपरीत उसी फिल्म समीक्षक ने अच्छा व्यवसाय कर रहे किसी फिल्म की ख़राब समीक्षा कर दी और संभावित दर्शकों के नहीं आने से वह फिल्म असफल हो जाती है| ऐसे ही आर्थिक समीक्षक के रूप में कार्य करती हैं क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां|

यहां यह जानना भी जरूरी है कि किसी देश, संस्था या व्यक्ति की रेटिंग बनाते समय ये कंपनियां कोई निश्चित फार्मूला नहीं अपनाती हैं बल्कि उपलब्ध आंकड़ों और अपने अनुभवों का इस्तेमाल कर रेटिंग बनाती हैं| लेकिन रेटिंग कम्पनियाँ रेटिंग देते समय देश, कम्पनी या व्यक्ति की लेनदारियों, देनदारियों, कुल संपत्ति, बाजार में साख, उनकी वृद्धि दर इत्यादि का विश्लेषण अवश्य करतीं हैं| मगर कई बार ये एजेंसियां असफल भी साबित हो जाती हैं जैसे साल 2007 की आर्थिक मंदी के दौरान इन रेटिंग एजेंसियों ने जिन कंपनियों और अर्थव्यवस्थाओं को बहुत अच्छी रेटिंग दी हुई थी वे भी आगे चल कर दिवालिया घोषित हो गई थी|

वर्तमान में भारत में 4 मुख्य क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां हैं:

1. क्रिसिल (CRISIL)

2. इक्रा (ICRA)

3. केअर (CARE)

4. डीसीआर इंडिया (DCR India)

इसमें सर्वप्रमुख स्थान क्रिसिल का है|

जानें विभिन्न रेटिंग का मतलब

  • रेटिंग का अर्थ  AAA  देश, कंपनी या व्यक्ति निवेश करना सबसे सुरक्षित और लाभदायक
  • AA  देश, कंपनी या व्यक्ति में अपने वादों को पूरा करने की काफ़ी क्षमता है
  • A  देश, कंपनी या व्यक्ति के पास अपने वादों को पूरा करने की क्षमता पर बदली विपरीत परिस्थितियों का असर पड़ सकता है
  • BBB  देश, कंपनी या व्यक्ति में अपने वादों को पूरा करने की क्षमता लेकिन विपरीत आर्थिक हालात से प्रभावित होनी की ज़्यादा गुंजाइश
  • CC देश, कंपनी या व्यक्ति वर्तमान में बहुत कमज़ोर
  • D देश, कंपनी या व्यक्ति उधार लौटाने में असफल

अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की बात की जाए तो इस समय रेटिंग की दुनिया में तीन बड़े नाम हैं:

1. स्टैण्डर्ड एंड पूअर

2. मूडीज़

3. फ़िच

इनमे सबसे पुरानी एजेंसी है स्टैण्डर्ड एंड पूअर जिसकी नींव 1860 में हेनरी पूअर ने रखी थी| मूड़ीज़ की स्थापना, वर्ष 1909 में जॉन मूडी नाम के व्यक्ति ने की थी| तीसरी प्रसिद्द रेटिंग एजेंसी है फिंच, जो कि स्टैण्डर्ड एंड पूअर और मूडीज़ का छोटा रूप है| आज दुनिया के रेटिंग व्यवसाय का क़रीब 40% कारोबार स्टैण्डर्ड एंड पूअर और मूडीज़ के कब्जे में है|

Credit Rating Agencies का महत्व क्यों बढ़ा है?

यदि किसी देश को अच्छी रेटिंग मिल जाती है तो पूरे विश्व के निवेशक उस देश में निवेश करने के लिए उत्साहित हो जाते हैं क्योंकि उनको यह विश्वास हो जाता है वे जहाँ पर निवेश करने जा रहे हैं,  वहां पर उनको अच्छा रिटर्न मिलेगा और उनका पैसा भी सुरक्षित रहेगा| यही बात किसी कंपनी या व्यक्ति के बारे में लागू होती है|

यदि किसी कंपनी की रेटिंग, एजेंसियों द्वारा अच्छी कर दी गयी है तो उस कम्पनी को बाजार से पैसे उधर लेने में परेशानी नही होगी साथ ही बाजार में अच्छी छवि के कारण इसके शेयर बाजार में महंगे बिकेंगे| यही कारण है कि देश, कंपनी औए व्यक्ति हमेशा अच्छी रेटिंग की खोज में रहते है| ज्ञातव्य है कि नवम्बर 2017 में मूडीज ने भारत की रैंकिंग को 13 वर्षों के इंतजार के बाद Baa3 से बेहतर करके Baa2 कर दिया था| इसका मतलब यह है कि अब भारत की अर्थव्यवस्था हलचल से मुक्त अर्थात “स्टेबल” था और यहां पर बड़ी मात्रा में निवेश किया जा सकता है|

पर अभी हाल में मूडीज ने भारत की अर्थव्यवस्था की रेटिंग को फिर से घटाकर नकारात्मक कर दिया है| इसका मतलब है की अब भारत में निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है| सारांश के तौर यह कहा जा सकता है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां बाजार की कार्यप्रणाली में बहुत ही अहम् रोल निभातीं हैं| लेकिन यह बात भी सच है कि निवेशकों को इन कंपनियों द्वारा दी गयी रैंकिंग को आंख बंद करके नही मानना चाहिए बल्कि धरातल पर उपलब्ध संभावनाओं की भी जांच कर लेनी चाहिए|