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चिटफंड संशोधन बिल-2019 लोकसभा में पास हुआ

मोदी सरकार ने 1982 के चिटफंड बिल में किये बदलाव

निवेशकों से ठगी के मामले प्रायः प्रकाश में आते हैं|उच्च रिटर्न का लालच लेकर निवेशकों की पूँजी हड़पने की खबरे हम सभी ने सुनी हैं|दरअसल ये सारे मामले चिटफंड कम्पनियों से जुड़े होते हैं|लगातार धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं पर नियंत्रण के लिए सरकार ने चिटफंड संशोधन बिल 2019 पेश किया है|लोकसभा में पास होने के बाद ये बिल अब राज्यसभा में पेश किया जायेगा|बता दें चिटफंड (Chitfund) की आड़ में हो रही धोखाधड़ी रोकने के लिए चिटफंड (अमेंडमेंटेंट) बिल, 2019 लोकसभा से पास हो गया है|सरकार ने सोमवार को लोकसभा में चिटफंड (अमेंडमेंटेंट) बिल, 2019 पेश किया था|काबिलेगौर है बीते कई दिनों से चिटफंड कम्पनियों से संबंधित घोटाले सामने आए हैं| ये कंपनियां प्रायः  चिटफंड की आड़ में कुछ गलत काम कर रही थी|जिसे देखते हुए मोदी सरकार ने 1982 के चिटफंड बिल में बदलाव करने का फैसला लिया|इस बिल के  पारित होने के बाद चिटफंड कंपनियों पर प्रभावी नियंत्रण हो सकेगा|संशोधन का मुख्य उद्देश्य चिटफंड कंपनियों को पारदर्शी बनाना है,जिससे धोखाधड़ी करना मुश्किल हो जाय|

ये हैं संशोधन :

चिटफंड कंपनियां बेहतर तरीके से विकास को सुनिश्चित करने के लिए चिटफंड संशोधन बिल में कई प्रावधान किए गए हैं|इन संशोधनों के अनुसार  चिटफंड में व्यक्तिगत और कंपनियों की निवेश की सीमा बढ़ाई गई है|चिटफंड में व्यक्तिगत निवेश की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 3 लाख रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया है| जबकि कंपनियों के लिए यह सीमा 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 18 लाख रुपये करने का प्रस्ताव है|बिल लागू होने के बाद चिटफंड में कोई भी कंपनी जो भी फैसला लेगी उसमें कम से कम दो सब्सक्राइबर का होना जरूरी होगा|इस बिल में दुरुपयोग रोकने के प्रावधान भी किये गए हैं|

क्या है चिटफंड?

चिटफंड कंपनियां दरअसल गैर-बैंकिंग कंपनियों की श्रेणी में आती हैं|इन कंपनियों को विशेष  योजना के तहत खास अवधि के लिए रिजर्व बैंक और सेबी की ओर से आम लोगों से मियादी (फिक्स्ड डिपाजिट) और रोजाना जमा (डेली डिपाजिट) जैसी योजनाओं के लिए धन उगाहने की अनुमति मिली होती है|किंतु  इजाजत मिलने के बाद कंपनियां प्रायः  अपनी मूल योजना से इतर विभिन्न लुभावनी योजनाएं बनाकर लोगों से धन उगाहना शुरू कर देती हैं|जिससे निवेशकों को नुकसान भी हो जाता है|ये कंपनियां चिटफंड एक्ट-1982 के तहत कार्य करती हैं|इस एक्ट के मुताबिक चिटफंड स्कीम का मतलब होता है कि कोई शख्स या लोगों का समूह एक साथ समझौता करे|चिटफंड एक्ट 1982 के सेक्शन 61 के तहत चिट रजिस्ट्रार की नियुक्ति सरकार के द्वारा की जाती है| चिटफंड के मामलों में कार्रवाई और न्याय निर्धारण का अधिकार रजिस्ट्रार और राज्य सरकार का ही होता है|

भारत में चिटफंड:

चिट फंड प्रणाली पूरी तरह से एक भारतीय अवधारणा है, अब विश्व स्तर पर संचालित है और सार्वभौमिक प्रशंसा को भी जीत चुका है।पुराने समय केरल के गांवों में, एक छोटे से किसानों के समूह द्वारा ये योजना संचालित हुई थी।जिसमें प्रत्येक किसान अनाज की एक निश्चित मात्रा समय समय पर एक चयनित ट्रस्टी को सौंप दे देते थे। वह ट्रस्टी उस अनाज के एक हिस्से को स्वयं रख लेता था, और बचा हिस्सा समूह के एक सदस्य को अपने सामाजिक प्रतिबद्धताओं और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए दे देता था। किसान जिसे अनाज का हिस्सा प्राप्त होता था, उसे अनाज का निश्चित मात्रा देने का कार्य जारी रखना पड़ता था जब तक समूह के हर सदस्य को अपना अपना हिस्सा नहीं मिल जाता। अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने पर, उनके भीतर प्रतियोगिता उत्पन्न होने लगी।कई सदस्य क्रम में जल्दी मौका पाने के लिये अनाज का एक निश्चित भाग (एक डिस्काउंट की तरह) त्यागना करने के लिए तैयार थे। इसलिए, एक नीलामी आयोजित की गई थी और सबसे कम बोली लगानेवाले को माल मिलता था। केरल राज्य वित्तीय उद्यम नामक एक कंपनी है जो केरल सरकार द्वारा संचालित है|चिट फंड की अवधारणा १८०० में लोगों की आँखों के सामने आयी जब राजा राम वर्मा- तत्कालीन कोचीन राज्य के शासक, एक सीरियाई ईसाई व्यापारी को एक ऋण दिया था, जिसमें खुद के अन्य खर्चों के लिए उसमें एक निश्चित भाग रख कर और बाद में वह समानता के सिद्धांत के आधार पर बाकी पैसे भी ले लिये|