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बजट 2020 वित्तीय घाटे को ले कर सरकार को हो सकती है परेशानी

वित्तय घाटे से हो सकती है परेशानी

सरकार 1 फरवरी को साल 2020-21 का बजट पेश करने वाली है। इस बजट मे लोगों की नजर वित्तीय घाटे पर रहेगी। आने वाले बजट मे वित्तीय घाटा सरकार के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। सरकार ने पिछले साल 2019-20 के बजट में जितना वित्तीय घाटा होने का अंदाज़ा लगाया था। उससे आठ महीने में सरकार को 14.8 प्रतिशत से अधिक का घाटा हो चुका है। कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट के मुताबिक 30 नवंबर को सरकार का वित्तीय घाटा 8,07,834 करोड़ रुपए पर पहुंच चुका था। सरकार ने एक कानून भी बनाया है जिससे वित्तय घाटा कम किया जा सके।

सरकार ने 2019-20 के बजट में कहा था कि इस साल में उसका वित्तीय घाटा 3.3 प्रतिशत या 7.03 लाख करोड़ रुपए रहेगा। सितम्बर के महीने मे सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स में बड़ी कटौती की थी। सरकार के अनुरूप बात करें तो इससे सरकार की आय 1.45 लाख करोड़ रुपए घट गई थी। बहुत सी एजेंसियां जो आर्थिक मुद्दों पर काम करती हैं उनका कहना था की कॉर्पोरेट टैक्स की कटौती वित्तीय घाटे को 0.7 फीसदी तक बढ़ा देगी। लेकिन सरकार का कहना था कि और अन्य माध्यमो से मिलने वाली बड़ी पूंजी के कारण इस कटौती का वित्तीय संतुलन पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन ये भी सच है आर्थिक सुस्ती के चलते जीएसटी मद में उम्मीद के हिसाब से उगाही नहीं हो पाई थी।

वित्तीय घाटा बढ़ने से नुकसान

वित्तीय घाटा बढ़ने पर सरकार को संतुलित बनाने के लिए अपने खर्च को घटाना होगा। जिस के कारण सरकार के द्वारा चलाई गई कल्याणकारी परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। नई कल्याणकारी परियोजना शुरू करने में भी सरकार को काफी  मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल वित्तीय मंत्रालय ने अन्य सभी मंत्रालयों को खर्च कम करने की सलाह भी दी है। सरकार यदि अधिक कर्ज़  लेती है काम चलाने के लिए तो इसका असर आप आदमी के जीवन पर भी पड़ेगा , इससे देश के हर आम व्यक्ति के सिर पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। कर्ज़ का ब्याज चुकाने के लिए सरकार को खर्च ज्यादा करना पड़ेगा। अगर सरकार खर्च घटाती है तो अर्थव्यवस्था में और मंदी आएगी। सरकार ने कहा है कि इस साल विकास दर पांच प्रतिशत रहेगी। जबकि चीन ने बताया है कि उसकी विकास दर 2019 में अनुमानित 6-6.5 फीसदी रही है। इस तरह से हम चीन से पीछे हो चुके हैं। अगर इसी तरह विकास दर कम होती रही तो पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना पूरा करने में बहुत लम्बा समय लग जायेगा।

एफआरबीएम कानून क्या है

सरकार ने 2003 में फिस्कल रिस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (एफआरबीएम) कानून लागू किया था। एफआरबीएम कानून के माध्यम से वित्तय घाटे को कम किया जा सके। वित्तय घाटा कम करने की सरकार की ये कानूनन जिमेदारी है।सरकार ने एनके सिन्हा समिति का गठन किया गया था मई 2016 मे एफआरबीएम कानून की समीक्षा के लिए। समिति के सुझावों के अनुसार वित्तीय घाटे को 31 मार्च 2020 तक घटाकर 3 प्रतिशत पर लाया जाए। 2020-21 में इसे और घटाकर 2.8 प्रतिशत और 2023 तक और घटाकर 2.5 प्रतिशत पर ले आया जाए।

पिछले 10 सालों के वित्तीय हालत

  • साल 2011-12 में वित्तीय घाटा 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गया था।
  • 2012-13 में यह घटकर 4.8 प्रतिशत पर आ गया था।
  • 2013-14 में यह और घटकर 4.4 प्रतिशत पर आया था।
  • 2014-15 में यह 4 प्रतिशत पर रहा।
  • 2015-16 में यह 3.9 प्रतिशत रहा।
  • 2016-17 में यह और घटकर 3.51 प्रतिशत रहा।
  • 2017-18 में यह थोड़ी बढ़कर 3.53 प्रतिशत रहा।
  • 2018-19 में यह 3.39 प्रतिशत रहा।
  • इस साल का लक्ष्य 3.3 फीसदी है।