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भारतीय अर्थव्यस्था और मंदी

क्या है मंदी?

भारतीय अर्थव्यवस्था  हर अवयव में मांग की कमी को देखा जा सकता है|निजी विमान कम्पनियों से लेकर टेलीकाम इंडस्ट्री तक आटोमोबाइल इंडस्ट्री से लेकर hal जैसी रक्षा कम्पनियां भी घाटे में चल रही हैं|रोजाना ही विभिन्न सेक्टरों में कर्मचारियों कि नौकरी जाने की खबरें आ रही हैं|हालाकि मोदी  सरकार के विभिन्न मंत्री लगातार  देश में मंदी की खबरों को नकारते  रहते हैं। इन परिस्थितियों में आयी आरबीआई की रिपोर्ट ने देश में मंदी के पुष्ट प्रमाण प्रस्तुत किये हैं|

क्या है मंदी?  

किसी भी अर्थव्यवस्था में  वस्तुओ और सेवाओ के उत्पादन में निरन्तर गिरावट हो रही हो और सकल घरेलू उत्पाद कम से कम तीन महीने से डाउन ग्रोथ में हो तो इस स्थिति को आर्थिक मन्दी कहते हैं। मंदी को “कुल उत्पादन, आय, रोजगार और व्यापार में गिरावट की आवर्ती अवधि के रूप में भी  परिभाषित किया जा सकता है| तकनीकी भाषा में मंदी का सामान्य अर्थ  है लगातार दो तिमाहियों के दौरान अर्थव्यवस्था में संकुचन।बीते दिनों  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इकोनॉमी की ग्रोथ रेट को बूस्ट करने के लि कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की घोषणा की थी।उन्होंने  बैंकिंग से लेकर ऑटो जैसे अधिकांश सेक्‍टर्स के लिए राहत की घोषणाएं हैं।ये सारे निर्णय भारतीय अर्थव्यस्था पर आसन्न मंदी के संकट से बचने के उपाय सरीखे ही हैं|

भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत

विदित हो कि देश के  बैंकिंग से लेकर ऑटो जैसे अधिकांश सेक्‍टर्स खपत में कमी से बेहाल नजर आ रहे हैं| देश कि बिस्किट कंपनी Parle ने जीएसटी के बढ़े रेट से नुकसान की बात की थी|उसके बाद ब्रिटानिया ने भी अपने प्रोडक्ट के वजन को कम करने की बात कही थी। असम के चाय उद्योग ने  भी सरकार से मदद की अपील की है ।इसके अलावा  टेक्सटाइल उद्योग ने तो अखबार में विज्ञापन देकर अपनी व्यथा सरकार को सुनाई थी।विभिन्न कंपनियों की तिमाही रिपोर्ट में भी ये  नुकसान दिखाई दिया।ऐसे में rbi की रिपोर्ट के मायने और भी बढ़ जाते हैं|आर.बी.आई की रिपोर्ट के दो मुख्य बिंदु हैं|

फंड फ्लो में गिरावट:

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2019-20 के अप्रैल से सितंबर माह तक बैंकिंग और नॉन बैंकिंग सेक्टर से कॉमर्शियल सेक्टर में फंड फ्लो 90,995 करोड़ रुपए था, जबकि पिछले साल इसी दौरान फंड फ्लो 7,36,087 करोड़ रुपए था।

आरबीआई ने घटाया वृद्धि दर का अनुमान

लगातार कमजोर हो रहे वैश्विक बाजार के कारण भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान शुक्रवार को 6.9 फीसदी से घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया है। बैंकों से कॉमर्शियल सेक्टर में होने वाला नॉन फूड क्रेडिट फ्लो 1.65 लाख करोड़ रुपए से घटकर 93 हजार करोड़ रुपए हो गया। लेकिन गैर बैंकिंग स्रोत से फंडिंग में 9 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है और यह आंकड़ा 58,326 करोड़ पर पहुंच गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पिछली कुछ तिमाही से गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल-जून की तिमाही में आर्थिक विकास दर 5 फीसदी से नीचे चली गई थी, जो कि पिछले 6 साल का सबसे खराब प्रदर्शन कहा जा सकता है।

मंदी के अन्य संकेत

मंदी के अन्य संकेतों में उत्पादन में कमी,बेरोजगारी और गिरती खपत वो महत्वपूर्ण कारक हैं जो ये बताते हैं कि देश में पूँजी का प्रवाह संकुचित हुआ है|इसे निम्न बिन्दुओं के अनुसार समझा जा सकता है|

  1. खपत मे कमी

अर्थव्यवस्था की धीमी  रफ्तार से खपत में कमी हो जाती है। साबुन, कपड़ा, बिस्कुट, जैसे घरेलु उत्पादों के साथ-साथ घरों और वाहनों की बिक्री भी घट जाती है।विशेषज्ञों के अनुसार गाड़ियों की कम होती बिक्री  सुस्त अर्थव्यवस्था का संकेत है। क्योंकि गाड़ी खरीदने में लोग लोग अतिरिक्त पैसे का प्रयोग करते हैं|

   2. औद्योगिक उत्पादन का कम होना

अर्थव्यवस्था में उद्योग  का बड़ा महत्व होता  है। जब उद्योग की रफ्तार धीमी होगी फिर उत्पाद बनने कम हो जाएंगे। इसमें निजी सेक्टर की बड़ी भूमिका होती है। जब सुस्ती आती है तो उद्योगों का उत्पादन कम हो जाता है। कल-कारखाने बंद होने लगते हैं। फैक्ट्रियों पर ताले लग जाते हैं, इसकी बड़ी वजह होती है कि बाजार में बिक्री घट जाती है। जब माल बनेगा नहीं तो माल ढुलाई, बीमा, गोदाम, वितरण जैसी सभी सेवाएं रूक जाएंगी।हाल में अशोक ली लैंड एवं मारुती जैसी कम्पनियों की उत्पादन इकाइयों में काम बंद होना मंदी को दर्शाता है|

 3. बेरोजगारी बढ़ना
अर्थव्यवस्था में सुस्ती से बेरोजगारी बढ़ जाती है। उत्पादन नहीं होगा तो उद्योग बंद हो जाएंगे। फिर लोगों की छंटनी शुरू हो जाती है। दरअसल, रोजगार सृजन में उत्पादन का बड़ा महत्व है|उत्पादन न होने से कर्मचारियों कि नौकरी जाने की दर बढ़ जाती है|

अब समय है जब सरकार को बड़े  निर्णय लेने होंगे|नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े निर्णयों का  बाजार पर खराब असर देखने को मिला है|  हाल में आयी  कैग रिपोर्ट से पता चला  है कि जीएसटी अपने स्वभाव के अनुरूप काम नहीं कर रहा है| ऐसे में वक्त है जब सरकार को  अर्थव्यवस्था में रोजगार उन्मुख बड़े और व्यापक बदलाव करने होगे|इन बदलावों से जब व्यक्ति की आय में सुधार होगा तब ओद्योगिक उत्पादों की खपत बढ़ेगी|