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मनरेगा में बढा युवाओं का अनुपात

2019-20 में बढ़े 9.1 फीसदी युवा मजदूर

मोदी सरकार की तमाम घोषणाओं के बावजूद युवाओं के लिए बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है|महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम  के तहत मजदूरी करने वाले युवाओं की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।इन आंकड़ों की मानें, तो ग्रामीण इलाकों में नोटबंदी और जीएसटी के बाद बेरोजगारी बढ़ी है।जिससे विवश युवा का आखिरी रोजगार विकल्प बन गया है मनरेगा|

सरकार के तमाम दावों की पोल खुली:

बता दें लोकसभा चुनावों में मोदी सरकार के घोषणा पत्र में प्रमुखता से रोजगार सृजित करने के वायदे किये गए थे|ऐसे में ये रिपोर्ट सरकार की बड़ी विफलता को आईना दिखा रही है|  इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक एक्सपर्ट ग्रामीण इलाकों में कृषि संकट और नौकरी के कम होते अवसरों को इसकी वजह मान रहे हैं। एक गैर-सरकारी संगठन ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ के संस्थापक सदस्य निखिल डे ने बताया कि अर्थव्यवस्था मंद पड़ गई है। ऐसे में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो गए हैं। इसलिए युवाओं ने मनरेगा की तरफ रुख किया है।

मनरेगा में युवा मजदूरों की बढ़ी संख्या:

वित्त वर्ष 2013-14 में मनरेगा के तहत काम कर रहे 18 से 30 वर्ष के युवाओं की संख्या   1 करोड़ से ज्यादा थी। हालांकि वित्त वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा घटकर 58.69 लाख हो गया। लेकिन नवंबर 2016 में नोटबंदी और 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू होने के बाद वित्त वर्ष 2018-19 में मनरेगा में काम करने वाले युवाओं की संख्या बढ़कर 70.71 लाख हो गई। युवाओं के इस अनुपात में बढ़ोतरी चालू वित्त वर्ष में भी जारी है। आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर माह तक मनरेगा के युवा कामगारों की संख्या 57.57 लाख हो गई है।

2019-20 में बढ़े 9.1 फीसदी युवा मजदूर

अगर अनुपातिक हिसाब से गणना करें, तो वित्त वर्ष 2013-14 में मनरेगा के तहत काम कर रहे युवाओं का अनुपात 13.64 प्रतिशत था और जो 2017-18 में घटकर 7.73 प्रतिशत हो गया, वो 2018-19 में बढ़कर 9.1 और 2019-20 में 10.06 प्रतिशत हो गया।