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राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को सरकार पूरा कर पायेगी या नहीं- बजट 2020

सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का 3.3 फीसदी का लक्ष्य तय किया था।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का 3.3 फीसदी का लक्ष्य तय किया था। लेकिन इस लक्ष्य के हासिल होने की संभावना कम ही दिखाई दे रही है।

हालाँकि कई अर्थशास्त्रियों ने चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को अपने अध्ययन में कुछ और ही पाया। वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत के लिए अपनी रेटिंग कमोवेश अपरिवर्तित रखी है। इसके तहत भावी परिदृश्य को स्थिर बताया गया है। फिच ने इस लक्ष्य को बढ़ाकर 3.6 फीसदी कर दिया है। वहीँ कैग (Comptroller & Auditor General of  India) की तरफ से जारी आंकड़ों में कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष के पहले 8 महीनों में ही राजकोषीय घाटा लक्ष्य के 115 फीसदी तक पहुंच गया है। इसकी दो वजहें हैं- पहला, आर्थिक सुस्ती के चलते टैक्स संग्रह कम रहा है।  दूसरा, सरकार सुस्त अर्थव्यस्था में जान फूंकने के लिए राहत पैकेज के एलान किए हैं।

राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा कर पाने में चूक

अब सवाल यही उठा रहा है कि क्या सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से चूक जाएगी?  विदित हो कि सरकार ने फिस्कल रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (FRBM ) एक्ट 2003 में लागू किया था। यह राजकोषीय घाटे को कम करने के वास्ते सरकार के लिए लक्ष्य तय करता है। सरकार ने 2003 में  इसे पारित करते हुए राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की बात कही थी। इसके तहत 2008-09 तक राजकोषीय घाटे के लिए 3 फीसदी का लक्ष्य तय किया था। उस साल रेवेन्यू डेफिसिट को शून्य फीसदी तक लाने का भी लक्ष्य रखा गया था।  लेकिन, सरकार इस लक्ष्य से चूकती रही है।

बीते आठ सालों का राजकोषीय घाटा गणित

वित्त वर्ष 2011-12 में राजकोषीय घाटा बढ़कर 5.7 फीसदी तक पहुंच गया। तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राजकोषीय घाटे का 4.1 फीसदी का लक्ष्य रखा। वित्त वर्ष 2015-16 के अपने बजट भाषण में उन्होंने राजकोषीय घाटे का रोडमैप पेश किया। इसके तहत वित्त वर्ष 2015-16 में 3.9 फीसदी, वित्त वर्ष 2016-17 में 3.5 फीसदी और वित्त वर्ष 2017-18 में 3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा गया। जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद फरवरी 2018 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को 3.5 फीसदी के घटाकर 3.2 फीसदी कर दिया गया था।