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7.5 फीसदी गिरकर 5 प्रतिशत हुई आर्थिक वृद्धि दर: अमिताभ कांत

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर गिरकर 5 प्रतिशत पर आ गई है

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने बताया की, सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और ऊंची आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर ले जाने के लिए हरसंभव कदम उठा रही है। उनका कहना है की पिछले पांच सालों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर औसतन करीब 7.5 प्रतिशत थी| चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में गिरकर 5 प्रतिशत पर आ गई है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्यरत है। रिजर्व बैंक आर्थिक वृद्धि दर को पटरी पर लाने के लिए रेपो दर में 1.10 प्रतिशत की कटौती कर चुका है जबकि सरकार ने भी तीन अलग – अलग चरणों में उपाय किए हैं। प्रक्रियायें कुछ इस  प्रकार  हैं।

आर्थिक वृद्धि दर की स्थिति सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाये गए कदम

बीते दिनों, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया था की, ‘महंगाई की दर 5 फीसदी नीचे है. उन्होंने कहा कि निर्यात क्षेत्र के लिए रण सुविधा बढ़ाने के उपायों से विशेषकर लघु एवं मझोले कारोबारों के लिए ब्याज सहित निर्यात ऋण की लागत कम करने में मदद करेगी| निर्यातकों के लिए ऋण को प्राथमिकता क्षेत्र के लिए ऋण का दर्जा देने का प्रस्ताव भारतीय रिजर्व बैंक के विचाराधीन है| इससे निर्यातकों को 36,000 करोड़ रुपये से लेकर 68,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्त पोषण मिलेगा| इनके अलावा इस महीने के अंत से इनपुट टैक्स क्रेडिट का पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक रिफंड, प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर बंदरगाहों और हवाईअड्डों पर माल की अवाजाही में लगने वाले समय को दिसंबर से कम करने तथा मुक्त व्यापार समझौता उपयोग मिशन की भी स्थापना करने का निर्णय लिया गया|

औद्योगिक उत्पादन में किये गए सुधार

औद्योगिक उत्पादन में सुधार के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं. सरकार ने रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति चार प्रतिशत से नीचे रखने का लक्ष्य दिया है| हालांकि खुदरा मुद्रास्फीति अगस्त में कुछ तेज होकर 3.21 प्रतिशत पर पहुंच गयी लेकिन यह अब निर्धारित है| आंशिक ऋण गारंटी योजना समेत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में ऋण का प्रवाह सुधारने के कदमों की घोषणा के परिणाम दिखाई देने लगे हैं| कई एनबीएफसी को फायदा हुआ है| सरकार ने इससे पहले वाहन क्षेत्र की मदद, पूंजीगत लाभ कर में कमी और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए अतिरिक्त नकदी की सहायता जैसे उपायों की घोषणा की थी. आर्थव्यवस्था में निवेश को गति देने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को और अधिक उदार बनाने और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के आपस में विलय के जरिए बड़े बैंक स्थापित करने के भी फैसले किए गए हैं|

निर्यातकों के लिए निर्यात ऋण बीमा योजना

निर्यात प्रोत्साहन के लिए जनवरी 2020 से एक नयी योजना – निर्यात उत्पादों पर करों एवं शुल्कों से छूट (रोडीटीईपी) दी जायेगी. यह देश से वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात संवर्धन की योजना (एमईआईएस) की जगह लेगी| सीतारमण ने कहा कि नयी योजना से निर्यातकों को इतनी राहत मिलेगी जो इस समय लागू सभी योजनाओं को मिला कर भी नहीं मिल पाती है| इस योजना से सरकारी राजस्व पर 50 हजार करोड़ रुपये का प्रभाव पड़ने का अनुमान है| सरकार मौजूदा योजनाओं के तहत निर्यातकों को 40 से 45 हजार करोड़ रुपये के शुल्कों/करों का रिफंड दे रही है. वाणिज्य विभाग के तहत एक अंतर-मंत्रालयी समूह निर्यात क्षेत्र को वित्त पोषण की सक्रिय निगरानी करेगा| इसके अलावा निर्यात ऋण गारंटी निगम (ईसीजीसी) निर्यात ऋण बीमा योजना का दायरा बढ़ेगा|   जिसकी सालाना लागत 1,700 करोड़ रुपये आएगी|

नीति आयोग के सीईओ का भी कहना है कि, सरकार सक्रिय है, भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी कारक मजबूत हैं और भारत को उच्च आर्थिक वृद्धि दर के रास्ते पर ले जाने के लिए जरूरी कदम उठाना जारी रहेगा। अमिताभ कांत ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किए गए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की संपत्तियों को बाजार में चढ़ाने के साथ – साथ विनिवेश भी अधिक होगा।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने GST काउंसिल की बैठक में इन सभी योजनाओं को ध्यान में रखते हुए उन पर तर्क-वितर्क करने का निर्णय लिया है| और जल्द ही अर्थव्यवस्था पर छाई मंदी पर निवारण लाया जाएगा|