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NCLAT के फैसले के खिलाफ TATA SONS ने की सुप्रीमकोर्ट में अपील

नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने अपने एक फैसले में 18 दिसंबर को सायरस मिस्त्री को फिर से tata sons का चेयरमैन बनाने का निर्णय सुनाया था     

टाटा संस और सायरस मिस्त्री के बीच टाटा समूह के वर्चस्व के लिए शुरू हुआ कानूनी संघर्ष समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है| आज सायरस मिस्त्री के मामले में टाटा सन्स ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी|

विदित हो कि NCLAT ने 18 दिसंबर को मिस्त्री के पक्ष में फैसला देते हुए फिर से उन्हें टाटा सन्स के चेयरमैन नियुक्त करने का आदेश दिया था| ट्रिब्यूनल ने मिस्त्री को हटाने और एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन नियुक्त करने के टाटा सन्स के फैसले को गलत बताते हुए सायरस मिस्त्री को फिर से चेयरमैन बनाने का आदेश दिया था| टाटा सन्स को अपील के लिए 4 हफ्ते का वक्त मिला था|

9 जनवरी को TCS के बोर्ड की अहम बैठक 

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार 9 जनवरी को टाटा ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की बोर्ड बैठक तय है| ज्ञात हो कि एन चंद्रशेखरन जो वर्तमान में टाटा संस के चेयरमैन हैं, वे TCS के चेयरमैन के पद के द्वारा ही टाटा समूह के शीर्ष पद पर बैठने में सफल हुए थे| ज्ञात हो कि एन चंद्रशेखरन ने TCS को भारत की शीर्षतम IT कंपनी बनाने में जी तोड़ मेहनत की थी| रतन टाटा का सहयोग भी एन चन्द्रशेखरन को प्राप्त है| ऐसे में 6 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट खुलेगा तो टाटा सन्स के वकील तुरंत सुनवाई की मांग करेंगे, इसकी पूरी उम्मीद हैं|

टाटा सन्स की 5 अहम दलीलें

  1. अपीलेट ट्रिब्यूनल ने इसकी कोई वजह नहीं बताई कि सायरस मिस्त्री को हटाने का फैसला गैर-कानूनी कैसे था?
  2. सायरस मिस्त्री की बहाली के अपीलेट ट्रिब्यूनल के आदेश से ग्रुप की अहम कंपनियों के कामकाज को लेकर भ्रम पैदा हुआ है|
  3. टाटा सन्स के चेयरमैन और निदेशक पद पर सायरस मिस्त्री का कार्यकाल मार्च 2017 में ही खत्म हो गया था| मिस्त्री ने बहाली की मांग नहीं की थी, लेकिन अपीलेट ट्रिब्यूनल ने याचिकाकर्ता की मांग से भी आगे जाकर फैसला दिया|
  4. रतन टाटा और टाटा ट्रस्ट के नामित व्यक्तियों के फैसले लेने पर रोक लगाना शेयरधारकों और बोर्ड ऑफ मेंबर्स के अधिकारों को दबाना है| इससे कॉर्पोरेट डेमोक्रेसी को नुकसान हो रहा है|
  5. ट्रिब्यूनल का आदेश खतरनाक कानूनी फैसले का उदाहरण है|

शुक्रवार को होगी सुनवाई

अपीलेट ट्रिब्यूनल ने टाटा सन्स-मिस्त्री मामले में फैसला देते हुए कहा था कि टाटा सन्स को पब्लिक से प्राइवेट कंपनी में बदलने की मंजूरी देने का फैसला गैर-कानूनी था| रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (ROC) ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि कानून के मुताबिक ही मंजूरी दी गई थी| ROC ने अपीलेट ट्रिब्यूनल के फैसले से सर्वप्रथम गैर-कानूनी शब्द हटाने की अपील की है| इस मामले में ट्रिब्यूनल ने सुनवाई शुक्रवार तक टाल दी| ट्रिब्यूनल ने कॉर्पोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री से कंपनीज एक्ट के नियमों के तहत प्राइवेट और पब्लिक कंपनियों की परिभाषा का ब्यौरा मांगा है|

मिस्त्री के पास है टाटा के 18.4% शेयर

सितंबर 2017 में टाटा सन्स को पब्लिक से प्राइवेट कंपनी बनाने के लिए शेयरधारकों ने मंजूरी दी थी| उसके बाद ROC ने टाटा सन्स को प्राइवेट कंपनी के तौर पर दर्ज किया था| इसके बाद कंपनी के अहम फैसलों के लिए शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी नहीं रही, सिर्फ बोर्ड की मंजूरी से फैसले लिए जा सकते हैं| सायरस मिस्त्री इसके खिलाफ थे| ज्ञात हो कि मिस्त्री परिवार के पास टाटा सन्स के 18.4% शेयर हैं| टाटा सन्स टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है|

यूं घटा सारा घटनाक्रम

टाटा सन्स के बोर्ड ने 24 अक्टूबर 2016 को मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटा दिया था| बोर्ड के सदस्यों का कहना था कि मिस्त्री पर भरोसा नहीं रहा| सूत्रों के अनुसार कुछ सदस्यों ने मिस्त्री पर बद्तमीजी के भी आरोप लगाए थे| इसके बाद दिसंबर 2016 में मिस्त्री ने टाटा ग्रुप की कंपनियों के निदेशक पद से भी इस्तीफा दे दिया था| उन्होंने चेयरमैन के पद से हटाने से फैसले को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में चुनौती दी थी| मिस्त्री ने टाटा सन्स के प्रबंधन में खामियों और अल्प शेयरधारकों को दबाने के आरोप लगाए थे| हालांकि NCLT ने पिछले साल जुलाई में टाटा सन्स के पक्ष में फैसला दिया था| इसके बाद मिस्त्री अपीलेट ट्रिब्यूनल NCLAT पहुंचे थे| जिसने 18 दिसंबर को सायरस मिस्त्री के पक्ष में फैसला दिया था और अमल में लाने के लिए 4 हफ़्तों की समयसीमा दी थी| विदित हो कि मिस्त्री अभी अपने परिवार के कारोबारी समूह की फर्म शपूरजी पलोंजी एंड कंपनी के एमडी हैं|

टाटा संस और सायरस मिस्त्री की यह क़ानूनी लड़ाई का अंतिम निर्णय भले कुछ भी हो मगर सभी पक्षों को यह जब ध्यान में रखना चाहिए कि उनके इस द्वन्द का कोई विपरीत प्रभाव कंपनी की साख पर न पड़ें|